Ruby Arun

Friday, 20 February 2026

पैक्स सिलिका डिक्लेरेशन क्या है, भारत के लिए अमेरिका की डिजिटल गुलामी या डिजिटल होस्टेज बनने की प्रक्रिया या आर्थिक तरक्की का रास्ता !


यह सीधे तौर पर #China के ख़िलाफ़ अमेरिका की एक आर्थिक किलेबंदी #Taiwan पर नियंत्रण/विकल्प और उसकी अपनी #राष्ट्रीय_सुरक्षा है और जिसमें भारत की 147 करोड़ की जनता "फिलहाल" एक #मोहरा है.


हालांकि,अगर भारत ने अपनी #संप्रभुता को गंवाए बिना रणनीतिक स्वायत्तता से मजबूती और तेजी से इस पर काम किया, तभी यह समझौता भारतीय हितों के लिए, बाद में जाकर, कारगर होगा. नौकरियां भी होंगी, मुनाफा भी होगा. 

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती ये होगी कि वह इस समझौते से तकनीक तो ले ले,लेकिन अपनी आत्मनिर्भरता खोए बिना...


वरना भविष्य में हमारी पूरी डिजिटल अर्थव्यवस्था की चाबी वॉशिंगटन के हाथ में होगी.

जब हम 147 करोड़ भारतीयों के डिजिटल डेटा, बैंक ट्रांजेक्शन #UPI और आधार जैसी पहचान की बात करते हैं, तो यह सीधे तौर पर भारत की "राष्ट्रीय सुरक्षा" का मामला बन जाता है.

#America और #India के बीच #Pax_Silica_Declaration हो चुका है. 

अगर भारत की पूरी डिजिटल अर्थव्यवस्था अमेरिकी चिप्स और उनके द्वारा बनाए गए #Standards पर चलने लगी,तो इसके गहरे जोखिम हो सकते हैं.


आज भारत दुनिया में सबसे ज्यादा डिजिटल ट्रांजेक्शन UPI के जरिए करने वाला देश है.यदि इन ट्रांजेक्शन को प्रोसेस करने वाली चिप्स या सर्वर में अमेरिका का #Backdoor हुआ, तो हमारे करोड़ों नागरिकों की वित्तीय जानकारी, खर्च करने की आदतें और निजी डेटा पर उनकी पूरी नजर होगी और #अमेरिका अपने हितों को साधने के लिए हमें  #Digital_Hostage भी बना सकता है.


मान लीजिए कि यदि भविष्य में भारत और अमेरिका के बीच किसी मुद्दे मसलन,रूस के साथ संबंध या कश्मीर के मसले पर मतभेद हो जाएं, तो अमेरिका अपनी तकनीक #Software_updates  या #Cloud_Services को रोककर हमारे डिजिटल बैंकिंग सिस्टम को अपाहिज बना सकता है.

जैसा कि #Russia - #Ukrain युद्ध के दौरान अमेरिका ने #रूस में #Visa और #Mastercard को रातों-रात बंद कर दिया था.


आज के दौर में स्मार्टफोन से लेकर मिसाइल डिफेंस सिस्टम तक, सब कुछ सिलिकॉन चिप्स पर निर्भर है.


 #Pax_Silica का लक्ष्य तकनीक के क्षेत्र में एक ऐसी व्यवस्था बनाना है जहाँ चिप्स का इस्तेमाल युद्ध या दबाव के बजाय विकास के लिए हो. 

लेकिन किसके विकास के लिए हो?

इसका जवाब इस सवाल में छुपा है कि,

अमेरिका ने भारत के साथ यह समझौता क्यों किया?


Pax Silica Declaration का मुख्य लक्ष्य सेमीकंडक्टर चिप्स,आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और महत्वपूर्ण खनिजों की एक सुरक्षित और भरोसेमंद सप्लाई चेन बनाना है.

दुनिया को अगले कुछ वर्षों में 10 लाख कुशल सेमीकंडक्टर पेशेवरों की जरूरत होगी. 

अमेरिका के पास तकनीक है लेकिन मैन्युफैक्चरिंग महंगी है. भारत में उसे #सस्ता और स्किल्ड लेबर बेस मिलेगा.

भारत का विशाल इंजीनियर पूल अमेरिका की इन कंपनियों जैसे #Intel, #NVIDIA #Micron आदि को सस्ता और प्रतिभावान वर्कफोर्स मुहैया कराएगा, जिससे अमेरिकी कंपनियों का मुनाफा बढ़ेगा.

#Semiconductor_Manufacturing दुनिया के सबसे जटिल और #Resource_intensive उद्योगों में से एक है. एक औसत चिप फैक्ट्री को रोजाना 3 से 5 करोड़ लीटर पानी और एक छोटे शहर के बराबर लगभग 100 से 200 MW बिजली की जरूरत होती है.

चिप बनाने के लिए साधारण पानी नहीं, बल्कि Ultra-Pure Water चाहिए होता है.यह इतना शुद्ध होता है कि इसमें से सभी खनिज और बैक्टीरिया निकाल दिए जाते हैं. एक छोटी सी चिप बनाने में करीब 32 लीटर पानी खर्च होता है.

हालांकि भारत में नदियों का जाल है, लेकिन नदियां संरक्षित नहीं हैं. 

ऐसे में यह बहुत बड़ी चुनौती होगी देश के लिए कि पीने के पानी,खेती और उद्योग के बीच पानी का संतुलन कैसे बनाया जा सकेगा.


अभी तक सबसे एडवांस चिप्स का 90% से ज्यादा उत्पादन केवल #ताइवान में होता है.आधुनिक मिसाइलें और #AI सिस्टम चलाने के लिए जिन चिप्स की जरूरत है,वे सभी ताइवान में बनती हैं.

अमेरिका नहीं चाहता कि ये तकनीक #चीन के हाथ लगे, क्योंकि इससे चीन की सैन्य शक्ति अमेरिका से ज्यादा शक्तिशाली हो सकती है.

यदि चीन ताइवान पर हमला करता है या उसकी घेराबंदी करता है,तो पूरी दुनिया में स्मार्टफोन, कार, और AI डेटा सेंटर्स का निर्माण ठप हो जाएगा.

इसलिए अमेरिका अब #ताइवान के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करने के लिए भारत को देख रहा है.


ताकि अमेरिका, ताइवान पर अपनी "निर्भरता" को खत्म करके भारत जैसे देशों को Pax Silica के जरिए अपने लिए एक #Safe_Haven बना सके.


कागजों पर तो यह "सौदा" बराबरी का है, क्योंकि बिना भारतीय इंजीनियरों और बाजार के,अमेरिका भी चीन का मुकाबला नहीं कर सकता.

इसलिए सबसे जरूरी बात यही है कि "मोहरा" होते हुए भी भारत को अपनी चाल पता होनी चाहिए. भारत अमेरिका से आर्थिक और तकनीकी मजबूती तो ले ले, लेकिन भारत अपनी खुद की तकनीक और मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत रखे. 

बिना अमेरिकी के सामने "सरेंडर" हुए अमेरिकी निवेश से देश में बनने वाली "मेक इन इंडिया" वाली चिप के सोर्स कोड' और 'हार्डवेयर डिजाइन' पर खुद का नियंत्रण रखें. 

इससे डिजिटल जासूसी और डिजिटल गुलामी का खतरा,खत्म तो नहीं पर कम जरूर हो सकता है.


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