Ruby Arun

Monday, 2 February 2026

नरेंद्र मोदी, देश की सुरक्षा के मसले पर आपात स्थिति में कठिन फैसला लेने में सक्षम नहीं हैं– जनरल नरवणे

 मोदी के राग,

ना कोई आया है ना कोई घुसा है..

कि बखिया उधेड़ दी है जनरल नरवणे की किताब ने.


#मोदी सरकार के लिए #जनरल_नरवणे की पुस्तक बेइज्जत करने वाली है क्योंकि यह सीधे तौर पर #PMO यानि प्रधानमंत्री कार्यालय की निर्णय लेने की प्रक्रिया और क्षमता पर सवाल उठाती है. पुस्तक बताती है कि मोदी सरकार आपात स्थिति में भी देश की सुरक्षा के लिए कठिन फैसले लेने में सक्षम नहीं है. नाकारा है. 

इसीलिए #Gen_Manoj_Mukund_Naravane

की किताब #Four_Stars_of_Destiny का वह हिस्सा है संसद में पढ़ने से Rahul Gandhi को सरकार ने रोक दिया जिससे उसके तथाकथित #राष्ट्रप्रेम की कलई खुल जाती. #China के आगे सरकार के झुक जाने की पोल खुल जाती. 

मोदी सरकार की बुद्धिहीनता की वजह से हमारे देश ने कैलाश रेंज' जैसी मजबूत बढ़त को खो दिया. 

भारत ने लगभग 26 पेट्रोलिंग पॉइंट्स पर अपनी पहुंच खो दी है.अब हमारे सैनिक उन जगहों पर नहीं जा सकते जहाँ वे 2020 से पहले जाते थे.

मोदी सरकार की बेवकूफी का खामियाजा ये हुआ कि समझौते के नाम पर भारत की ज़मीन पर ही 'बफर ज़ोन' बन गए.

मोदी द्वारा अपनी जवाबदेही से भागने की कीमत भारत ने अपनी जमीन और गश्त करने के अधिकार को खोकर चुकाई है.


जनरल नरवणे की पुस्तक के इस अंश में 'कायरता' चेन ऑफ कमांड या 'कठिन निर्णय' की बात की है .

जनरल नरवणे ने लिखा है कि जब सरकार को एक फैसला लेना चाहिए था तब सरकार ने उनके हाथ उन्हें "Hot Potato" थमा दिया था.

जब देश की संप्रभुता खतरे में थी, तब शीर्ष नेतृत्व को स्पष्ट "Engagement Rules" देने चाहिए थे, न कि जिम्मेदारी पूरी तरह सेना पर छोड़नी चाहिए थी.

सरकार द्वारा "जो उचित लगे वो करो" कहकर जिम्मेदारी सेना पर छोड़ने से भारत को रणनीतिक और कूटनीतिक नुकसान हुए.

31 अगस्त 2020 को रात 8.15 बजे

चार चीनी टैंक पूर्वी लद्दाख में रेचिन ला की ओर एक खड़ी पहाड़ी के रास्ते आगे बढ़ने लगे थे. टैंक कैलाश रेंज पर भारतीय ठिकानों से कुछ सौ मीटर की दूरी पर थे.

भारतीय सैनिकों ने एक चेतावनी के तौर पर illuminating round फायर किया लेकिन चीनी आगे बढ़ते रहे.

जनरल नरवणे ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह; राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल; चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत; और विदेश मंत्री एस जयशंकर आदि को ताबड़तोड़ फोन किए.

'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' में नरवणे लिखते हैं, 'मेरा हर किसी से एक ही सवाल था, 'मेरे लिए आदेश क्या हैं?'

क्योंकि स्थिति तेजी से बिगड़ रही थी और स्पष्टता की जरूरत थी. 

मौजूदा प्रोटोकॉल के मुताबिक नरवणे को साफ आदेश थे कि "जब तक ऊपर से मंजूरी न मिले, तब तक गोली न चलाएं "


रात 10 बजे तक भी चीनी टैंक नहीं रुके थे.वे अब टॉप से सिर्फ पांच सौ मीटर दूर थे. चीनी सेना को रोकने का एकमात्र तरीका हमारी अपनी मीडियम आर्टिलरी से फायरिंग करना था, जो तैयार थी और आदेश का इंतजार कर रही थी " 


स्थिति बेहद नाज़ुक थी.टकराव की संभावित जगहों पर नज़र रखी जा रही थी. लेकिन फैसले का पॉइंट रेचिन ला था. नरवणे ने रक्षा मंत्री को एक और फोन किया. जिन्होंने वापस फोन करने का वादा किया. समय बीतता गया. हर मिनट, चीनी टैंक टॉप पर पहुंचने के एक मिनट करीब आ रहे थे.

राजनाथ सिंह ने रात 10.30 बजे वापस फोन किया.उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की थी, मोदी से सलाह ली गई थी. उन्हें ब्रीफ किया गया था लेकिन नरेंद्र मोदी ने फैसला लेने से मना कर दिया था.

मोदी ने कहा कि "जो उचित समझो, वह करो" ..

सरकार ने जोखिम लेने से बचने के लिए जिम्मेदारी सेना के पाले में डाल दी.

युद्ध जैसी स्थिति में जब राजनीतिक नेतृत्व स्पष्ट आदेश नहीं देता, तो सेना 'अनिर्णय' की स्थिति में रहती है.

 इससे दुश्मन को अपनी चालें चलने के लिए अतिरिक्त समय मिल जाता है.

चीन ने भी मोदी के फैसला नहीं के पाने की कमजोरी का फायदा उठाया और वह भारत की सीमा


में अंदर तक घुस कर बस चुका है.

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