यह सब कुछ एक 'पॉलीटिकल थ्रिलर' जैसा है. राजनीति, व्यापार, पुरानी दोस्ती, आयकर विभाग की रेड और अखबार के पन्नों पर छपी एक #मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री #मोहन_यादव के घोटालों की सनसनीखेज खबर...
इस तीखे अखबार-धमाके के पीछे की जो कहानी सियासी सिंडिकेट्स में तैर रही है, उसके किरदार बेहद रसूखदार हैं.
सियासी गलियारों में चर्चा है कि मोहन यादव के घोटालों के खुलासे के पीछे मध्यप्रदेश के एक पूर्व मुख्यमंत्री #S हैं.
जिन्होंने अपने एक इंफ्रास्ट्रक्चर किंगपिन उद्योगपति दोस्त #D का #कर्ज़ चुकाने के लिए वर्तमान मुख्यमंत्री पर हमला किया है क्योंकि ये मुख्यमंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री के बिल्डर उद्योगपति दोस्त को चौतरफा परेशान कर रहे थे.
राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, लेकिन जब दोस्ती पुरानी हो, तो वह सत्ता के गलियारों में बड़े समीकरण बनाती है...
राज्य के नए नेतृत्व द्वारा, वर्ष 2025 में उद्योगपति "D " के ठिकानों पर हुई बड़ी रेड भी पुराने सिंडिकेट के समीकरण को तोड़ने की कवायद थी.
मध्य प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में यह जगजाहिर है कि पूर्व मुख्यमंत्री "S" और इंफ्रास्ट्रक्चर किंगपिन "D " के बीच छात्र जीवन से गहरा दोस्ताना रहा है.
जब S मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तो D का ग्राफ स्थानीय ठेकेदार से उठकर देश की सबसे बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों में शामिल हो गया. मध्य प्रदेश के अधिकांश बड़े हाईवे, भोपाल-इंदौर मेट्रो प्रोजेक्ट के हिस्से, फ्लाईओवर और टेंडर इसी कंपनी के खाते में गए.जिसे विपक्ष द्वारा 'क्रॉनी कैपिटलिज्म' का नाम दिया गया था.
दिसंबर 2023 में जब जब मोहन यादव को मध्य प्रदेश की कमान सौंपी गई, तो केवल चेहरा नहीं बदला, बल्कि सत्ता का 'पावर सेंटर' भी बदल गया.
मोहन यादव ने आते ही राज्य के पुराने ठेकेदारों और कॉरपोरेट दिग्गजों के एकाधिकार को तोड़ना शुरू किया. टेंडर्स के नियम बदले गए और अपने नए चेहरों को तरजीह देने लगे. पुराने रसूखदार उद्योगपतियों और उनसे जुड़े नेटवर्क्स पर आयकर विभाग के छापे पड़ने लगे.
राजनीति में जब सीधे मोर्चे पर लड़ना मुमकिन नहीं होता, तो 'दस्तावेजों' को हथियार बनाया जाता है.
वर्तमान मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवार के उज्जैन लैंड डील्स के बेहद गोपनीय सरकारी और खसरा रिकॉर्ड्स जिस बारीकी से मीडिया तक पहुंचे हैं, वह बिना किसी 'इनसाइडर' के मुमकिन ही नहीं था.
अखबार के पन्नों पर छपी यह रिपोर्ट महज जमीनों का ब्योरा नहीं है, बल्कि सत्ता, कॉरपोरेट और पुरानी वफादारियों के बीच छिड़ी एक 'अघोषित जंग' का नतीजा है. यह मध्य प्रदेश की सियासत के दो बड़े गुटों के बीच का 'ओपन वॉरफेयर' है.
यह इशारा है कि पुराना सिंडिकेट आसानी से मैदान छोड़ने को तैयार नहीं है.....

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