Turkiye के प्रसिद्ध न्यूरोसर्जन Dr. Ali Zırh द्वारा Parkinson’s के एक मरीज की,की गई डीप ब्रेन स्टिमुलेशन सर्जरी की दुनिया भर के चिकित्सा जगत में चर्चा है.
DBS को ब्रेन पेसमेकर' भी कहते हैं और यह सर्जरी न्यूरोलॉजिकल बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए एक वरदान है.
DBS दुनिया की पहली सर्जरी नहीं है। इसका इस्तेमाल दुनिया भर में 1990 के दशक से हो रहा है लेकिन जब लोग पहली बार किसी मरीज को ऑपरेशन टेबल पर होश में रहते हुए, सर्जरी के तुरंत बाद अपनी कांपती उंगलियों और हाथों पर पूर्ण नियंत्रण पाते देखते हैं, तो यह किसी चमत्कार जैसा लगता है.
पार्किंसंस बीमारी में मरीज के हाथ-पैर इस हद तक कांपते हैं कि वह एक चम्मच पानी भी खुद नहीं पी सकता. लेकिन इस सर्जरी के दौरान जैसे ही डॉक्टर मस्तिष्क के सटीक बिंदु पर इलेक्ट्रोड रखकर हल्का इलेक्ट्रिकल करंट चालू करते हैं, मरीज के हाथों का कंपकंपाना और जकड़न कुछ ही सेकंड में रुक जाती है.
यह बदलाव इतना तुरंत और हैरान कर देने वाला होता है कि देखने वाले के लिए यह किसी जादू जैसा लगता है.
सर्जरी टेबल पर मरीज का जगा रहना और डॉक्टर के सवालों का जवाब देना, कभी-कभी गाना गाना, मोबाइल चलाना या सेल्फी वीडियो बनाना–लोगों के लिए बहुत अनूठा दृश्य होता है.
मस्तिष्क में दर्द के रिसेप्टर्स नहीं होते, इसलिए सिर का बाहरी हिस्सा सुन्न करने के बाद मरीज को दर्द का अहसास नहीं होता.
डॉक्टर मरीज की खोपड़ी में सूक्ष्म छेद करके मस्तिष्क के उस विशेष हिस्से जैसे Subthalamic Nucleus में बेहद पतले इलेक्ट्रोड डालते हैं, जो शरीर के कंपन, अकड़न और संतुलन को नियंत्रित करता है.
इन तारों को त्वचा के नीचे से लाते हुए छाती के ऊपरी हिस्से में लगे एक छोटे उपकरण न्यूरोस्टिमुलेटर या बैटरी से जोड़ दिया जाता है.
यह बैटरी मस्तिष्क के असामान्य या गड़बड़ सिग्नल देने वाले हिस्सों को लगातार हल्के इलेक्ट्रिकल पल्स भेजती है. इससे मस्तिष्क के वे सिग्नल रुक जाते हैं जो कपकंपी और जकड़न पैदा करते हैं.
डॉक्टर दिमाग की हर उस Cell की विद्युत तरंगों को एक लाउडस्पीकर के जरिए सुनते हैं जो बीमारी फैला रही है. मरीज जब उंगलियां हिलाता है या बोलता है, तो डॉक्टर Subthalamic Nucleus की पहचान 80 माइक्रोन से भी कम मार्जिन के साथ सटीक रूप से कर पाते हैं.
DBS सर्जरी पार्किंसंस को जड़ से तो खत्म नहीं करती, लेकिन यह बीमारी के लक्षणों को 10 से 15 साल पीछे जरूर धकेल देती है जो मरीज व्हीलचेयर या दूसरों की मदद पर निर्भर हो चुके होते हैं, वे दोबारा आत्मनिर्भर होकर अपनी सामान्य जिंदगी जीने लगते हैं.
दवाओं की भारी खुराक और उनके साइड-इफेक्ट्स पर निर्भरता काफी कम हो
जाती है.
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