Ruby Arun

Thursday, 18 June 2026

भारत में बेरोज़गारी अमेरिका में निवेश !

 

मोदी जी देश को बताएं कि अमेरिकी राष्ट्रपति के दावों के पीछे का सच क्या है?
देश की जनता को ये जानने का पूरा हक है कि देश की गाढ़ी कमाई और कॉर्पोरेट संसाधन किस दिशा में जा रहे हैं....
एक तरफ नरेंद्र  मोदी देश के भीतर 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' का गा गा कर कसीदा पढ़ते रहते हैं. पूरी दुनिया घूम टहल कर विदेशी निवेशकों को भारत बुलाने की हवाई बातें करते हैं .
दूसरी तरफ,अमेरिकी राष्ट्रपति सरेआम मंच से कहते हैं कि "भारत के प्रधानमंत्री अमेरिका में बहुत पैसा खर्च कर रहे हैं और वहां नौकरियां पैदा कर रहे हैं.
यह इस सदी का सबसे बड़ा आर्थिक विरोधाभास है कि भारत का युवा आज दशकों की सबसे ऊंची बेरोज़गारी दर झेलने को मजबूर है,और मोदी राज में भारतीय कॉर्पोरेट्स को भारत के बजाय अमेरिका में निवेश करना और वहां रोजगार सृजित करना ज्यादा सुरक्षित और फायदेमंद लग रहा है.
आखिर जो सरकार खुद निवेश के लिए दुनिया का मुंह ताकती है, उसके राज में ऐसा क्या हो रहा है कि देश का पैसा बाहर जा रहा है?
क्या नरेंद्र मोदी को, देश के प्रधानमंत्री के तौर पर इतनी समझ भी नहीं है कि हेडलाइंस मैनेजमेंट और कूटनीतिक बयानों से देश का पेट नहीं भरता.
देश को प्रधानमंत्री के खोखले वादों की नहीं, बल्कि ठोस और पारदर्शी आर्थिक नीतियों की ज़रूरत है.
चूंकि यह मामला सीधे तौर पर देश के करोड़ों लोगों की रोजी रोटी, देश  की आर्थिक नीतियों और वैश्विक छवि से जुड़ा है, इसलिए सरकार की तरफ से आधिकारिक डेटा या स्पष्टीकरण आना बेहद जरूरी है कि भारत का जो पैसा अमेरिका को समृद्ध और विकसित बनाने में जा रहा है तो
* क्या यह निवेश आम आदमी के टैक्स के पैसे यानी सरकारी खजाने से हो रहा है या निजी क्षेत्र द्वारा?

* इससे भारत के घरेलू उद्योगों और विदेशी मुद्रा भंडार पर क्या असर पड़ रहा है?

* भारतीय बाजारों से कितनी भारी मात्रा में पोर्टफोलियो निवेश बाहर गया है ?
और भारतीय शेयर बाजार से कितने विदेशी निवेशकों ने पैसा निकाला है कि जिससे रुपये पर दबाव बना है और रुपया बेहद कमजोर हुआ है?

* जिन बड़ी विदेशी कंपनियों के भारत आने की उम्मीद थी वो कंपनियां वियतनाम,थाईलैंड या बांग्लादेश क्यों चली गईं ?

* भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशों में किए जा रहे निवेश से भारत के नागरिकों को क्या हासिल हो रहा है?

* देश से बाहर जा रहे धन यानी #CapitalOutflow और घरेलू बेरोज़गारी के बीच के इस चक्रव्यूह को सरकार कैसे तोड़ेगी?

#FDI #EconomicCrisis #MakeInIndia #Unemployment #IndianEconomy #Transparency

Wednesday, 17 June 2026

अब इंडो पैसिफिक ओशियन पर कब्जा करेगा अमेरिका ?

 


#मोदी-ट्रंप मीटिंग से पहले #अमेरिका ने भारत को झटका दे दिया है.अमेरिका ने सैन्‍य कमांड से 'भारत' को बाहर कर दिया है.

#America के रक्षा विभाग ने घोषणा की है कि उसके सबसे बड़े सैन्य कमांड #Indo_Pacific_Command से वह #Indo शब्द हटा रहा है. उसने अपना पुराना नाम #US पैसिफिक कमांड' फिर से अपनाने का फैसला किया है और इसमें से #हिंदमहासागर' का जिक्र हटा दिया गया है.

#DonaldTrump के पहले कार्यकाल के दौरान 'पैसिफिक कमांड' को 'इंडो-पैसिफिक' नाम दिया गया था और ऐसा #China को रोकने के लिए #भारत के रणनीतिक महत्व को ध्यान में रखते हुए किया गया था.


तो क्या अब अमेरिका की नजर में भारत के पास कोई रणनीतिक भूमिका नहीं बची है? क्या #Asia-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका के लिए भारत का कोई भू-राजनीतिक महत्व नहीं रह गया है?

अमेरिका ने ये फैसला तब किया जब आज फ्रांस में प्रधानमंत्री #नरेन्द्र_मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति #डोनाल्ड_ट्रंप की मुलाकात होने वाली है.

अमेरिका के इस कदम के बाद भारत के तथाकथित 'बैकयार्ड' दक्षिण एशिया में अब चीन और #Pakistan का भू-राजनीतिक, भू-आर्थिक और सैन्य दबदबा होगा.

अमेरिका का यह सैन्य कमांड अमेरिका के पश्चिमी तट के पास के पानी से लेकर भारत की पश्चिमी सीमा तक फैला हुआ है.

तो सवाल ये है कि ट्रंप की #चीन और #पाकिस्तान को लेकर क्या रणनीति है?

क्योंकि #हिंद_महासागर में चीन की घेराबंदी के लिए भारत के बिना अमेरिका की कोई भी रणनीति अधूरी है. फिर भी अमेरिका ने ये फैसला किया है?

यहां याद रखने वाली बात ये है कि अमेरिका ने पाकिस्तान को #IRAN से संबंधित अपने सबसे बेहद जरूरी मसलों में भी साझीदार बनाये रखा है.


जब भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई बड़ा Symbolism बदलता है, तो उसके पीछे गहरे कूटनीतिक संदेश छिपे होते हैं. 'इंडो-पैसिफिक' से दोबारा 'पैसिफिक' कमांड पर लौटना निश्चित रूप से एक बड़ा नीतिगत बदलाव संकेत करता है.

तो क्या इसका मतलब यह है कि अमेरिका की नजर में भारत का महत्व खत्म हो गया है?


ये संशय और सवाल इसलिए क्योंकि जियो पॉलिटिक्स सिर्फ उतना नहीं होता जितना दिखाई देता है. यहां नेताओं के मुंह से निकले एक एक शब्द के कई मायने होते हैं.

इसीलिए 'इंडो-पैसिफिक कमांड' से 'इंडो' शब्द हटाने के भी कई मतलब हैं.


तो क्या भारत ये उम्मीद करे अपने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से की जब वो आज ट्रंप से मिलेंगे तो यह स्पष्ट करेंगे ट्रंप के साथ कि यदि अमेरिका 'इंडो-पैसिफिक' के विचार से पीछे हटता है, तो भारत भी अमेरिकी प्राथमिकताओं जैसे दक्षिण चीन सागर में अपनी दिलचस्पी कम कर सकता है??


क्योंकि यह ट्रंप का यह कदम  'अमेरिका फर्स्ट' और सौदेबाजी वाली विदेश नीति का हिस्सा है, जहां वह हर रिश्ते की री-पैकेजिंग करना चाहते हैं. तो क्या मोदी जी भी भारत की अखंडता और संप्रभुता की ध्यान में रख कर अमेरिका के साथ अपने "निजी" रिश्तों  की री पैकेजिंग करने की दृढ़ता दिखा पाएंगे ?

Has Modi Ji been stunned by Trump–G7 summit

 

Has Modi Ji b


een stunned by Trump, just like someone gets paralyzed by fear (like a snake's gaze)?

Modi Ji has become completely silent and passive.

Trump isn't just speaking; he is commanding.

Modi Ji’s laughter, banter, voice, smiles, giggles, and "Instagram" presence have all vanished.

​Listen to Trump's controlling tone—

​"We have over $19.2 trillion coming in, and we're building factories, we're building everything. Prime Minister Modi is building a lot in the United States, he is spending a lot of money in the United States, so we appreciate that—jobs... But, I just want to say that he has been a friend of mine for a long time, and we've always had a great relationship, and 'it's great to be with you'."


​(Obviously, America's treasury is being filled with the money from Indians' pockets).

Thank you very much...

​$19.2 trillion in numbers means: ₹1,593,600,000,000,000, which is approximately ₹1,593.6 lakh crore...

Although this is in the context of total global investment or revenue, and not just India's investment.

But within this $19.2 trillion, there is a massive amount invested by Modi Ji from India. The investments made by India are creating millions of jobs in America.

​And here in our own country, students and the unemployed are being beaten with police batons and sticks, and are being sent to jail for jobs...

Monday, 23 March 2026

अर्धसैनिक बल बनाम आईपीएस –अर्धसैनिक बल एडमिस्ट्रेटिव बिल राज्य सभा में

 


#CAPF एडमिनिस्ट्रेटिव बिल के खिलाफ #CAPFs अधिकारियों के पत्नी बच्चे #जंतर_मंतर पर..
गृह मंत्री @AmitShah आज राज्यसभा में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल विधेयक पेश करेंगे, जिसमें #IG स्तर पर #IPS अधिकारियों की नियुक्ति के नियम तय होंगे. बिल में #आईपीएस अधिकारियों की नियुक्ति पर 50 प्रतिशत सीमा रखी गई है, जबकि #SupremeCourt ने आदेश दिया था कि #अर्धसैनिक_बलों में डेप्युटेशन के जरिए IPS नियुक्ति 2 वर्षों में कम किया जाए, ताकि ज्‍यादा से ज्‍यादा #ParaMilitry कैडर अधिकारियों को बलों में उच्च पदों तक प्रमोशन मिले.
जबकि #मोदी_सरकार के द्वारा पेश किए जाने वाले विधेयक में कहा गया है कि केंद्र सरकार के पास इस मामले में कोर्ट के आदेशों से हटकर नए नियम बनाने का अधिकार होगा.
बिल में प्रावधान किया गया है कि इन बलों का मुखिया यानि #DG, आईपीएस अधिकारी ही बनेगा.
#ADG के पद पर कम से कम 67 फीसदी नियुक्ति आईपीएस अधिकारियों की होगी.
#आईजी स्तर के पदों पर 50 फीसदी नियुक्ति आईपीएस अधिकारियों में से की जाएगी.
वर्तमान व्यवस्था में भी DG के पद पर आईपीएस अधिकारियों की नियुक्ति होती है.
एडीजी स्तर पर 67 % और आईजी स्तर पर 50% अधिकारियों की नियुक्ति आईपीएस से की जाती है.

CAPF बनाम IPS विवाद की सबसे बड़ी वजह यही है.
#पैरामिलिट्री फोर्सेज के अधिकारी और IPS दोनों का ही चयन #UPSC के ही माध्यम से होता है. फिर भी एक IPS अधिकारी आमतौर पर 13-14 साल की सेवा में DIG रैंक तक पहुच जाता है. वहीं, CAPF के कैडर अधिकारी को उसी DIG रैंक तक पहुंचने में 25 से 30 साल लग जाते हैं.
एक CAPF में एक असिस्टेंट कमांडेंट को 13–14 सालों तक भी कोई प्रमोशन नहीं मिलता जबकि इतने ही वक्त में एक IPS अधिकारी को 2 बार प्रोन्नति मिल चुकी होती है.
प्रोन्नति की इस विसंगति की वजह से अर्धसैनिक बलो में बेहद क्षोभ और असंतोष का माहौल है.
पिछले 3 सालों में इस वजह से CAPF के 20 हजार से ज्यादा जवानों और अधिकारियों ने #VRS ले लिया है या इस्तीफा दे दिया है.
#NFFU #OGAS
#CRPF #BSF #CISF #ASSAMRIFLES #CoBRA #SSB #ITBP
#संसद_पैरामिलिट्री_बचाओ

Sunday, 22 March 2026

सैनिक स्कूलों का 'पार्टनरशिप मॉडल': राष्ट्र निर्माण या शिक्षा का बाजारीकरण !


 सरकार का यह फैसला "Last nail in the coffin" की तरह है.

#मोदी_सरकार ने 100 नए सैनिक स्कूल #PPP मॉडल पर खोलने का निर्णय लिया है.

#सैनिक_स्कूल केवल स्कूल नहीं, बल्कि #Indian_Army की 'नर्सरी' रहे हैं. इनका मूल आधार समानता, कठोर अनुशासन और #अराजनीतिक चरित्र रहा है. जब इनकी शिक्षा का प्रबंधन निजी हाथों में जायेगा तो क्या वे "लाभ की मानसिकता" से ऊपर उठकर सेना के उन उच्च आदर्शों को बनाए रख पाएंगे?

रिपोर्ट्स बताती हैं कि इन नए स्कूलों का आवंटन कई ऐसी संस्थाओं को हुआ है जिनकी अपनी राजनीतिक या धार्मिक विचारधाराएँ हैं.

** सेना की सबसे बड़ी ताकत उसका #Apolitical होना है. यदि बचपन से ही भावी सैनिकों की शिक्षा किसी विशेष विचारधारा के साये में होगी, तो क्या यह भविष्य में सेना के निष्पक्ष ढांचे के लिए चुनौती बन जाएगा.

** पुराने सैनिक स्कूलों में एक गरीब किसान का बेटा भी अधिकारी बनने का सपना देख सकता था. निजी भागीदारी के साथ 'फीस' का ढांचा बदल सकता है. हालांकि सरकार छात्रवृत्ति की बात करती है, लेकिन क्या निजी प्रबंधन वाले स्कूलों में वह Inclusive संस्कृति बच पाएगी जो सरकारी संस्थानों की पहचान है?

** शिक्षा और सुरक्षा राज्य के प्राथमिक कर्तव्य हैं. 100 नए स्कूल खुद न बनाकर निजी क्षेत्रों को सौंपना, सरकार का अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटना नहीं है? 

क्या सरकार "कम लागत" के चक्कर में भविष्य के नेतृत्व की "गुणवत्ता" से समझौता नहीं कर रही?

–– अनुशासन और सैन्य मूल्यों का विस्तार स्वागत योग्य है, लेकिन यह 'कॉर्पोरेट मॉडल' पर आधारित तो बिल्कुल नहीं होना चाहिए. शिक्षा का उद्देश्य 'नागरिक' बनाना है,#Product नहीं.

यदि इन स्कूलों पर कड़ा सरकारी नियंत्रण और पारदर्शी चयन प्रक्रिया नहीं रही, तो यह #राष्ट्रसेवा के नाम पर #पूंजीपतियों के स्वार्थ को साधने वाला गुलाम बन कर रह जाएगा.

** सेना में प्रवेश के लिए प्राथमिक शिक्षा का निजीकरण करना,भविष्य में #Merit की बजाय #Influence और #Privilege  को जगह देगा.

 यह #राष्ट्रीय_सुरक्षा के उस मजबूत ढांचे के लिए घातक होगा जिसे बनाने में #देश को दशकों लगे हैं.


#SainikSchool #EducationPolicy #Defense #NationalSecurity #Privatization #IndiaDebates

Saturday, 21 March 2026

इंदिरा गांधीने अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को सबक सिखा दिया, लेकिन नरेंद्र मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आगे झुक गए....


 #RichardNixon ने #IndiraGandhi को #US_Navy का Seventh Fleet भेजने की धमकी दी थी, लेकिन वे नहीं डरीं. उन्होंने निक्सन को स्पष्ट कह दिया कि #भारत वही करेगा जो उसे सही लगता है. #इंदिरा_गांधी ने निक्सन के दबाव में नहीं आईं और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर कायम रहीं.

लेकिन नरेंद्र मोदी ट्रंप के सामने पूरी तरह झुक गए हैं. Rahul Gandhi इस मामले में जो तर्क दे रहे हैं, वे बिल्कुल सही हैं.

"इंदिरा गांधी ने निक्सन के सामने जो साहस दिखाया, वह भारतीय नेतृत्व की एक सशक्त मिसाल है.

:·– राम पुनियानी 


1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन द्वारा बंगाल की खाड़ी में 'सातवां बेड़ा' भेजने की धमकी के पीछे कई रणनीतिक और कूटनीतिक कारण थे.

अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों के आधार पर निक्सन को यह डर था कि इंदिरा गांधी का इरादा केवल बांग्लादेश बनाना ही नहीं है, बल्कि वह पश्चिमी पाकिस्तान (आज का पाकिस्तान) की सेना को भी पूरी तरह खत्म कर देना चाहती हैं.

उन्हें डर था कि अगर पाकिस्तान एक देश के रूप में बिखर गया, Middle East तक जाने वाला अमेरिकी रास्ता बंद हो जाएगा.

उस समय शीत युद्ध चरम पर था. अमेरिका, पाकिस्तान को दक्षिण एशिया में अपना एक महत्वपूर्ण सहयोगी मानता था.निक्सन और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर को डर था कि अगर भारत पाकिस्तान को पूरी तरह हरा देता है, तो इस क्षेत्र में अमेरिकी प्रभाव खत्म हो जाएगा और सोवियत संघ का दबदबा बढ़ जाएगा.

निक्सन उस समय चीन के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रहे थे, और इस काम में पाकिस्तान एक 'बिचौलिए' की भूमिका निभा रहा था. 

निक्सन को लगा कि अगर उन्होंने पाकिस्तान की मदद नहीं की, तो चीन को लगेगा कि अमेरिका अपने दोस्तों का साथ नहीं देता, जिससे उनकी चीन के साथ होने वाली डील खतरे में पड़ सकती थी.

अमेरिका का मुख्य उद्देश्य युद्ध में सीधे शामिल होना नहीं, बल्कि भारत पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना था.

सातवें बेड़े के परमाणु संचालित विमानवाहक पोत USS Enterprise को बंगाल की खाड़ी की ओर भेजकर निक्सन यह संदेश देना चाहते थे कि भारत ढाका यानी पूर्वी पाकिस्तान पर कब्जा न करे.

और भारत पश्चिमी पाकिस्तान पर हमला करके उसे पूरी तरह नष्ट न कर दे.

निक्सन का सबसे बड़ा डर यह था कि अगर भारत इस युद्ध में पूरी तरह जीत जाता है, तो दक्षिण एशिया में USSR का वर्चस्व स्थापित हो जाएगा .

भारत और सोवियत संघ के बीच 1971 की मित्रता संधि ने अमेरिका को बेचैन कर दिया था. निक्सन को लगा कि पाकिस्तान की हार का मतलब है अमेरिकी प्रभाव की हार और रूसी साम्यवाद की जीत.


उस दौर के रिकॉर्ड्स बताते हैं कि निक्सन और किसिंजर की निजी बातचीत में इंदिरा गांधी के प्रति काफी कड़वाहट थी, क्योंकि उन्होंने अमेरिकी कूटनीति को पूरी तरह विफल कर दिया था.

जापान की सड़कों पर फूटा लोगों का गुस्सा, युद्ध के खिलाफ किया प्रदर्शन

 🚨 #Japanकी सड़कों पर फूटा जनसैलाब! 🔥

#Tokyo में संसद के बाहर 11,000 लोगों की गर्जना— "हमें युद्ध नहीं, शांति चाहिए"

जापान की प्रधानमंत्री #Sanae_Takaichi वर्तमान में वह #America की यात्रा पर हैं और राष्ट्रपति  #DonaldTrump के साथ उनके करीबी संबंधों और रक्षा समझौतों को लेकर ही जापान की एक बड़ी आबादी असहज और नाराज़ है. उन्हें डर है कि इससे जापान अनचाहे वैश्विक संघर्षों में घसीटा जा सकता है.

अपने देश के प्रधानमंत्री के मुखालिफ जापानी लोगों का संदेश साफ है:–

"जापान का भविष्य #Washington में नहीं है" जापानी जनता अब अपनी विदेश नीति खुद तय करना चाहती है. अपनी संप्रभुता के लिए #Trump को आईना दिखा रही है.

जापान की 82% जनता युद्ध के खिलाफ है. वह अपनी सरकार की 'सैन्य नीति' पर सवाल उठा रही है. ट्रंप की नीतियों के पीछे चलने का विरोध कर रही है.

जापान  की सड़कों पर उतरा यह जनसैलाब वैश्विक राजनीति में आ रहे बड़े बदलावों की ओर इशारा कर रहा है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से जापान का संविधान शांतिवादी रहा है.लेकिन हाल के वर्षों में रक्षा बजट में भारी बढ़ोतरी और सैन्य नीतियों में बदलाव ने आम जनता को चिंतित कर दिया है.

प्रदर्शनकारियों का मुख्य गुस्सा इस बात पर है कि जापान की नीतियां स्वतंत्र होने के बजाय #Washington के प्रभाव में अधिक दिख रही हैं.

जापान में जनमत हमेशा से युद्ध के खिलाफ रहा है। वहां की जनता "Article 9" जो जापान को युद्ध करने से रोकता है, को अपनी पहचान का हिस्सा मानती है.

#JapanRising #NoWar #ForeignPolicy

#JapanProtest #Geopolitics  #AntiWar #WorldPolitics #Peace #Protest #USA