रूस में यूक्रेन युद्ध और प्रतिबंधों के कारण पैदा हुई मजदूरों की किल्लत को पूरा करने के लिए रूस की असेंबली लाइनों, कपड़ा फ़ैक्टरियों,खेतों, कारखानों,निर्माण स्थलों और किचनों में इन दिनों उत्तर कोरियाई महिलाओं की ब्रिगेड चुपचाप तैनात की जा रही है.उत्तर कोरिया से हजारों महिलाओं और पुरुषों को रूस के गारमेंट में काम करने भेजा जा रहा है.
रूस पहुंचते ही उत्तर कोरियाई अधिकारी इन श्रमिकों के पासपोर्ट और दस्तावेज जब्त कर लेते हैं, ताकि वे भाग न सकें.
उत्तर कोरियाई महिलाओं को प्रति घंटे महज 480 रूबल मतलब भारतीय रुपए के हिसाब 550 रुपए ही दिये जाते हैं. और 24 घंटे इनकी निगरानी की जाति है. इनसे 12 से 16 घंटे मजदूरी कराई जाती है. काम के बाद इन्हें बंद कमरों में कड़े पहरे के बीच रखा जाता है.
उत्तर कोरिया पर सख्त अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हैं.इसलिए वह अपने नागरिकों को विदेश में काम पर भेजकर उनका अधिकांश वेतन लगभग 70% से 80% खुद रख लेता है, जिससे किम जोंग उन सरकार को विदेशी मुद्रा मिलती है. इस तरह से नॉर्थ कोरियाई बंधुआ मज़दूरों को प्रति घंटे महज 120 रूपये से 144 रुपए ही मिल पाते हैं.
उत्तर कोरियाई सरकार 'लोयल्टी टैक्स' और सरकारी कोटे के नाम पर ये पैसे,प्योंगयांग का ख़जाना भरने के लिए, मजदूरों से ऐंठ लेती है.
इस ख़ौफ़नाक गठजोड़ को यूक्रेन युद्ध के कारण रूस में पैदा हुई मजदूरों की किल्लत और किम जोंग उन की विदेशी मुद्रा की भूख ने जन्म दिया है.
बंद कारखानों की दीवारों के पीछे हज़ारों जिंदगियां बिना पहचान और बिना आज़ादी के किम शासन के लिए अपना खून पसीना बहाने पर मजबूर हैं.
UN सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के तहत उत्तर कोरियाई श्रमिकों को विदेश में रोजगार देने पर प्रतिबंध है, लेकिन रूस और उत्तर कोरिया के बीच मजबूत होते सैन्य व आर्थिक संबंधों के तहत यह व्यवस्था चल रही है.
दो तानाशाही व्यवस्थाएं हज़ारों बेबस महिलाओं के श्रम को बेचकर अपना राजनीतिक और आर्थिक एजेंडा साध रही हैं.
