Ruby Arun

Thursday, 25 June 2026

If Passports and Aadhaar Cards Do Not Prove National Citizenship, Is the Government Planning a Nationwide NRC Under the Pretext of a National Identity Card?


If Passports and Aadhaar Cards Do Not Prove National Citizenship, Is the Government Planning a Nationwide NRC Under the Pretext of a National Identity Card?

If this is the case, it could prove to be a highly complex challenge in practice—one that leaves the citizens of this country standing in queues for years and severely disrupts the country's administrative machinery.

Although governments have long been considering a single, sovereign document that serves as the ultimate proof of citizenship, the legal framework for creating this "Master Card" of citizenship—such as a National Identity Card—already exists on paper. However, in a vast, diverse, and under-documented country like India, this presents a colossal entanglement.

The financial cost of a nationwide NRC could run into billions and trillions of rupees, becoming a massive burden on the country's economy.

Millions of government employees—including teachers, tehsildars, and clerks—would have to be deployed for this task for years, completely paralyzing regular public administration and services.

The country has already witnessed a small trailer of the NRC in Assam. The NRC process in just one state cost approximately ₹1,600 crore and took over 10 years to complete.

In the final list, around 1.9 million (19 lakh) people were excluded, many of whom had family members registered on the list. This included relatives of former President Fakhruddin Ali Ahmed and retired officers of the Indian Army.

A vast segment of India's population, particularly in rural areas, among the poor, tribal communities, and migrants, still does not possess definitive documents regarding their birth or lineage.

Before 1989–90, the practice of generating digital birth certificates was virtually non-existent in the country.

Due to floods, fires, displacement, or poverty, millions of people have lost their old records. In such a scenario, demanding decades-old legal proof from over 1.3 billion people would be nothing short of a nightmare.

Spelling mistakes in names, surnames, or age are extremely common in Indian government documents. In Assam, millions of people got entangled in proving their citizenship simply due to mismatched spellings.

And finally, the biggest practical question is: if at the end of the process, a few million or crore people fail to prove their citizenship—even if strictly due to a lack of documentation—what will the government do with them?

Will they be kept in Detention Centers? Building and operating detention centers on such a massive scale is practically impossible on both financial and humanitarian fronts.

Furthermore, such individuals cannot be deported to countries like Bangladesh or Myanmar either, because until those nations accept them as their own citizens, they would become 'Stateless' under international law.

These are the exact challenges that forced previous governments to tread very cautiously, despite having the legal framework ready on paper. This caution exercised by past administrations is presented by the current government as an accusation before the public, claiming that previous regimes sheltered infiltrators.

Ultimately, these are the very economic and social challenges due to which the decision to implement this at a national level has always remained a highly sensitive issue for past governments.

क्या सरकार National Identity Card के बहाने देशव्यापी NRC करने की सोच रही है!

 


#Passport और #आधार_कार्ड से देश की नागरिकता साबित नहीं होती तो क्या सरकार #National_Identity_Card के बहाने देशव्यापी #NRC करने की सोच रही है? अगर ऐसा है तो ये व्यावहारिक रूप से यह देश की जनता को सालों तक कतारों में खड़ा करने और सालों तक देश की प्रशासनिक व्यवस्था को दर-बदर करने जैसी एक बेहद जटिल चुनौती साबित हो सकती है...
हालांकि सरकारें काफी समय से एक ऐसे सिंगल,Sovereign दस्तावेज़ पर विचार करती रही हैं जो नागरिकता का अंतिम सच हो. नागरिकता का 'मास्टर कार्ड' बनाने की कानूनी रूपरेखा जैसे राष्ट्रीय पहचान पत्र, पहले से ही कागज़ों पर भी मौजूद है. पर भारत जैसे विशाल, विविधतापूर्ण और कम-दस्तावेज़ीकरण वाले देश में एक भयंकर उलझन है.
–देशव्यापी NRC का वित्तीय खर्च अरबों-खरबों रुपये में हो सकता है, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए मुसीबत बन जाएगा.
–लाखों सरकारी कर्मचारियों–शिक्षकों, तहसीलदारों, क्लर्कों–को सालों तक इसी काम में लगाना होगा, जिससे बाकी सरकारी कामकाज ठप्प हो जायेंगे..
NRC का एक छोटा ट्रेलर देश असम में देख चुका है.केवल एक राज्य की NRC प्रक्रिया में लगभग 1,600 करोड़ रुपये खर्च हुए और 10 साल से ज़्यादा का समय लगा..
अंतिम सूची में करीब 19 लाख लोग बाहर हो गए, जिनमें से कई ऐसे थे जिनके परिवार के बाकी सदस्यों के नाम सूची में थे. इनमें पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के रिश्तेदार और भारतीय सेना के रिटायर्ड अफसर तक शामिल थे.

–भारत की एक बहुत बड़ी आबादी विशेषकर ग्रामीण इलाकों में, गरीबों, आदिवासियों और प्रवासियों के पास,आज भी अपने जन्म या वंश के पक्के कागज़ात नहीं रखती..
देश में 1989-90 से पहले जन्म प्रमाण पत्र डिजिटल रूप से बनाने का चलन शायद ही था.
बाढ़, आग, विस्थापन या गरीबी के कारण लाखों लोग अपने पुराने रिकॉर्ड खो चुके होते हैं. ऐसे में 130 करोड़ से ज़्यादा लोगों से दशकों पुराने कानूनी सबूत मांगना एक Nightmare जैसा होगा.

–भारत में सरकारी कागज़ातों में नाम, सरनेम या उम्र की स्पेलिंग में गलतियाँ होना बहुत आम है. असम में सिर्फ स्पेलिंग की मिसमैच की वजह से लाखों लोग अपनी नागरिकता साबित करने में उलझ गए.

–और आखिर में सबसे बड़ा व्यावहारिक सवाल यह है कि यदि प्रक्रिया के अंत में देश के कुछ लाख या करोड़ लोग अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाए,भले ही कागज़ात न होने के कारण, तो सरकार उनका क्या करेगी?
क्या उन्हें Detention Centers में रखा जाएगा? इतने बड़े पैमाने पर डिटेंशन सेंटर बनाना और उन्हें चलाना आर्थिक और मानवीय दोनों मोर्चों पर लगभग असंभव सी बात है.
क्योंकि ऐसे लोगों को किसी दूसरे देश जैसे बांग्लादेश या म्यांमार भी नहीं भेजा जा सकता, क्योंकि जब तक वह देश उन्हें अपना नागरिक स्वीकार नहीं करता, तब तक वे अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत 'Stateless' हो जाएंगे..
यही सारी चुनौतियां हैं जिनकी वजह से पिछली सरकारों ने कानूनन रूपरेखा होने के बावजूद, इसे पूरे देश में लागू करने के कदम बहुत फूंक-फूंक कर रखा. पिछली सरकारों के इस एहतियात को आज की सरकार आरोप के रूप में देश की जनता के सामने परोसती है कि पिछली सरकारों ने देश में घुसपैठियों को शरण दी.

यही वे आर्थिक और सामाजिक चुनौतियां हैं, जिनकी वजह से राष्ट्रीय स्तर पर इसे लागू करने का फैसला हमेशा से पिछली सरकारों के लिए एक बड़ा संवेदनशील मुद्दा रहा है.

Tuesday, 23 June 2026

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव का ज़म8न घोटाल– घात प्रतिघात का खेल

 


यह सब कुछ एक 'पॉलीटिकल थ्रिलर' जैसा है. राजनीति, व्यापार, पुरानी दोस्ती, आयकर विभाग की रेड और अखबार के पन्नों पर छपी एक #मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री #मोहन_यादव के घोटालों की सनसनीखेज खबर...

इस तीखे अखबार-धमाके के पीछे की जो कहानी सियासी सिंडिकेट्स में तैर रही है, उसके किरदार बेहद रसूखदार हैं.
सियासी गलियारों में चर्चा है कि मोहन यादव के घोटालों के खुलासे के पीछे मध्यप्रदेश के एक पूर्व मुख्यमंत्री #S हैं.
जिन्होंने अपने एक इंफ्रास्ट्रक्चर किंगपिन उद्योगपति दोस्त #D का #कर्ज़ चुकाने के लिए वर्तमान मुख्यमंत्री पर हमला किया है क्योंकि ये मुख्यमंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री के बिल्डर उद्योगपति दोस्त को चौतरफा परेशान कर रहे थे.
राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, लेकिन जब दोस्ती पुरानी हो, तो वह सत्ता के गलियारों में बड़े समीकरण बनाती है...
राज्य के नए नेतृत्व द्वारा, वर्ष 2025 में उद्योगपति "D " के ठिकानों पर हुई बड़ी रेड भी पुराने सिंडिकेट के समीकरण को तोड़ने की कवायद थी.
मध्य प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में यह जगजाहिर है कि पूर्व मुख्यमंत्री "S" और इंफ्रास्ट्रक्चर किंगपिन "D " के बीच छात्र जीवन से गहरा दोस्ताना रहा है.
जब S मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तो D का ग्राफ स्थानीय ठेकेदार से उठकर देश की सबसे बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों में शामिल हो गया. मध्य प्रदेश के अधिकांश बड़े हाईवे, भोपाल-इंदौर मेट्रो प्रोजेक्ट के हिस्से, फ्लाईओवर और टेंडर इसी कंपनी के खाते में गए.जिसे विपक्ष द्वारा 'क्रॉनी कैपिटलिज्म' का नाम दिया गया था.
दिसंबर 2023 में जब जब मोहन यादव को मध्य प्रदेश की कमान सौंपी गई, तो केवल चेहरा नहीं बदला, बल्कि सत्ता का 'पावर सेंटर' भी बदल गया.
मोहन यादव ने आते ही राज्य के पुराने ठेकेदारों और कॉरपोरेट दिग्गजों के एकाधिकार को तोड़ना शुरू किया. टेंडर्स के नियम बदले गए और अपने नए चेहरों को तरजीह देने लगे. पुराने रसूखदार उद्योगपतियों और उनसे जुड़े नेटवर्क्स पर आयकर विभाग के छापे पड़ने लगे.
राजनीति में जब सीधे मोर्चे पर लड़ना मुमकिन नहीं होता, तो 'दस्तावेजों' को हथियार बनाया जाता है.
वर्तमान मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवार के उज्जैन लैंड डील्स के बेहद गोपनीय सरकारी और खसरा रिकॉर्ड्स जिस बारीकी से मीडिया तक पहुंचे हैं, वह बिना किसी 'इनसाइडर' के मुमकिन ही नहीं था.

अखबार के पन्नों पर छपी यह रिपोर्ट महज जमीनों का ब्योरा नहीं है, बल्कि सत्ता, कॉरपोरेट और पुरानी वफादारियों के बीच छिड़ी एक 'अघोषित जंग' का नतीजा है. यह मध्य प्रदेश की सियासत के दो बड़े गुटों के बीच का 'ओपन वॉरफेयर' है.
यह इशारा है कि पुराना सिंडिकेट आसानी से मैदान छोड़ने को तैयार नहीं है.....


Saturday, 20 June 2026

डोनाल्ड ट्रंप और जॉर्जिया मेलोनी की निजी लड़ाई, कूटनीतिक कड़वाहट में बदली!

 राष्ट्रपति #DonaldTrump और इटली की प्रधानमंत्री #Georgia_Meloni के बीच विवाद एक फोटो खिंचाने के दावे से शुरू हुआ,यह अब केवल एक तस्वीर खिंचाने की बात नहीं रह गई है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय संधियों, सैन्य बेस के इस्तेमाल और दो देशों की संप्रभुता के सम्मान की एक बड़ी कूटनीतिक लड़ाई में बदल गई है .

#ट्रंप ने इटली के टीवी चैनल #La7 को दिए इंटरव्यू में दावा किया कि मेलोनी ने G7 समिट के दौरान उनके साथ फोटो खिंचाने के लिए बहुत मिन्नतें की थीं. मुझे उन पर तरस आ गया और मैं मान गया.

मेलोनी ने इस पर बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए एक वीडियो बयान जारी किया और ट्रंप के दावों को पूरी तरह से झूठा और मनगढ़ंत बताया.

आज ट्रंप ने फिर कहा कि मेलोनी ने उनके साथ तस्वीर खिंचाने के लिए बार-बार भीख मांगी. ऐसा मेलोनी ने इसलिए किया क्योंकि उनकी लोकप्रियता इटली में लगातार गिर रही है. ट्रंप ने आरोप लगाया कि जब #अमेरिका, #IRAN को परमाणु हथियार बनाने या हासिल करने से रोक रहा था, तब #Italy ने #America का साथ नहीं दिया.अपने लैंडिंग स्ट्रिप्स या रनवे का इस्तेमाल भी अमेरिकी सेना को नहीं करने दिया, जिससे भारी सैन्य और साजो-सामान की असुविधा हुई. अब जब अमेरिका ने सैन्य रूप से #ईरान को हरा दिया है, तो मेलोनी अपनी राजनीतिक रेटिंग सुधारने के लिए फिर से अमेरिका से दोस्ती करना चाहती हैं, लेकिन मेरी तरफ से उन्हें साफ़ ना है—"No thanks!!!"

मेलोनी ने ट्रंप के इन आरोपों को बिना किसी हिचकिचाहट के सीधे खारिज किया और बेहद कड़े शब्दों में लिखा:–

"राष्ट्रपति ट्रंप, ये लगातार हो रहे बिना किसी उकसावे के हमले पूरी तरह से senseless हैं. आपका दोस्त होने से मेरी लोकप्रियता में कोई मदद नहीं मिली है और न ही मेरी लोकप्रियता आपके साथ मेरे संबंधों पर निर्भर करती है. मेरी लोकप्रियता इटली के राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने की मेरी क्षमता पर निर्भर करती है.

वैसे भी,मेरी लोकप्रियता आपकी चिंता का विषय नहीं है.मेरा सुझाव है कि आप अपनी लोकप्रियता पर ध्यान दें.

इटली एक संप्रभु राष्ट्र sovereign nation है और वह उन्हीं नियमों के साथ काम करेगा जो अमेरिकी सैन्य ठिकानों का उपयोग करने के लिए किए गए समझौतों हैं"

इटली के विदेश मंत्री #Antonio_Tajani ने ट्रंप के बयानों को मेलोनी और पूरे इटली का अपमान बताते हुए अपना निर्धारित अमेरिका दौरा तुरंत रद्द कर दिया है. उन्हें 21–22 जून को मियामी में इटली-यूएस बिजनेस फोरम' में हिस्सा लेना था और अमेरिकी विदेश मंत्री #Marco_Rubio से मुलाकात होनी थी. इटली के राष्ट्रपति #Sergio_Mattarella सहित सरकार के तमाम मंत्रियों ने मेलोनी का समर्थन किया है और ट्रंप के इस रवैये को एक पुराने सहयोगी देश के साथ 'धोखा' करार दिया है.



Again closure strait of hormuz to all vessels

 

Iran’s Revolutionary Guard Corps (#IRGC) has announced the closure of the #StraitOfHormuz to all vessels. The Navy has cited alleged ceasefire violations by the United States and Israel as the reason for


this move.

​The IRGC's announcement to close the #StraitOfHormuz just ahead of the US-Iran talks scheduled for June 21 in Switzerland is no coincidence. This is a calculated strategy by Iran to dictate its terms at the negotiation table and exert maximum pressure on the United States.

​This blockade is not the beginning of a war, but rather a "bargaining chip." If Iran does not secure tangible diplomatic or economic concessions during the Switzerland talks, this "choke point" could remain closed for an extended period, pushing the world into a new and catastrophic recession. It will be interesting to see whether the United States bows to this blackmail or puts on a display of military might. Washington currently cannot afford another major global war, and Iran is well aware of this vulnerability.

​Through this narrative, Iran is attempting to project itself on the global stage as "defensive" rather than the aggressor. Iran is also signaling its Middle Eastern proxy networks, the Houthis and Hezbollah, that it is playing on the front foot.

​#IRAN has made it clear that if it is cornered economically or militarily, it will not hesitate to choke the jugular vein of the global economy.

​The IRGC's allegations of ceasefire violations against #America and #Israel demonstrate that the regional conflict has now escalated into a phase that directly impacts global trade.

Friday, 19 June 2026

खी खी खी खी– सरकार और सरकार से जुड़े लोगों की "आधिकारिक" भाषा बन गई है.


 खी खी खी खी– सरकार और सरकार से जुड़े लोगों की "आधिकारिक" भाषा बन गई है.

सवाल का जवाब ना पता हो तो–

खी खी..

सवाल का जवाब नहीं देना हो तो–

खी खी..

और खी खी के साथ कुछ भी उल जुलूल फिजूल की बात कह कर जिम्मेदारियों, जवाबदेहियों से बच निकलना...


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रधान सचिव रहे,देश के सबसे शक्तिशाली नौकरशाहों में गिने जाने वाले और श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा का ही जवाब सुन लीजिए भगवान #श्रीराम के मंदिर के दान पात्र से हुई 

सैकड़ों करोड़ रुपयों और गहनों की चोरी के सवाल पर... 😌

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्यों चुप हैं भगवान श्रीराम के मंदिर में हुई लूट पर!

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्यों चुप हैं भगवान #श्रीराम के मंदिर के दान


पात्र से हुई चोरी पर ? सबसे बड़ी जवाबदेही तो मोदी जी की ही बनती है ना ! 

2024 के आम चुनाव और उससे पहले, राम मंदिर निर्माण को प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा की एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में पेश किया गया. तो इससे जुड़े विवाद की जिम्मेदारी भी मोदी जी की ही बनती है.

जब किसी बड़े राष्ट्रीय या धार्मिक कार्य का राजनीतिक और चुनावी श्रेय किसी नेता या दल को मिलता है, तो वहां होने वाली कमियों या विवादों की जिम्मेदारी किस पर तय होनी चाहिए?

लोकतांत्रिक और नैतिक व्यवस्था में यह नियम लागू होता है कि जिस परियोजना या विज़न का नेतृत्व देश का शीर्ष नेता कर रहा हो, वहां की व्यवस्था को साफ-सुथरा रखने की नैतिक जिम्मेदारी भी कहीं न कहीं नेतृत्व पर आती है. हालांकि, तकनीकी और कानूनी रूप से ट्रस्ट एक स्वतंत्र निकाय है, लेकिन जनता की नजरों में सरकार और ट्रस्ट की छवि आपस में जुड़ी हुई है.

हिंदू बचाने आए हैं, सनातन बचाने आए हैं– का डंका, बेतहाशा पीटा गया.

ये किस तरह जगाया गया हिन्दुओं को कि वो अपने आराध्य की पूजन सामग्री पर ही डाका डालने लगा ? अपने भगवान को ही छलने लगा ?

सनातन को ये कैसे बचाया गया कि वो नारे लगाने वालों की ही लूट और डकैती का शिकार हो गया ?

मंदिर हों या सत्ता – देश को सिर्फ मूर्ख बनाया गया. जिन्होंने धर्म के नाम पर सत्ता पाई, उन्होंने ही धर्म/हिंदू को सबसे ज्यादा क्षति पहुँचा

ई...

ना राम की मर्यादा का पालन किया ना सीता का सम्मान रखा..

बस लालची, भ्रष्ट, अनैतिक कृत्य करने वाले चोर लुटेरों असुरों का झुंड तैयार कर दिया..

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