#Passport और #आधार_कार्ड से देश की नागरिकता साबित नहीं होती तो क्या सरकार #National_Identity_Card के बहाने देशव्यापी #NRC करने की सोच रही है? अगर ऐसा है तो ये व्यावहारिक रूप से यह देश की जनता को सालों तक कतारों में खड़ा करने और सालों तक देश की प्रशासनिक व्यवस्था को दर-बदर करने जैसी एक बेहद जटिल चुनौती साबित हो सकती है...
हालांकि सरकारें काफी समय से एक ऐसे सिंगल,Sovereign दस्तावेज़ पर विचार करती रही हैं जो नागरिकता का अंतिम सच हो. नागरिकता का 'मास्टर कार्ड' बनाने की कानूनी रूपरेखा जैसे राष्ट्रीय पहचान पत्र, पहले से ही कागज़ों पर भी मौजूद है. पर भारत जैसे विशाल, विविधतापूर्ण और कम-दस्तावेज़ीकरण वाले देश में एक भयंकर उलझन है.
–देशव्यापी NRC का वित्तीय खर्च अरबों-खरबों रुपये में हो सकता है, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए मुसीबत बन जाएगा.
–लाखों सरकारी कर्मचारियों–शिक्षकों, तहसीलदारों, क्लर्कों–को सालों तक इसी काम में लगाना होगा, जिससे बाकी सरकारी कामकाज ठप्प हो जायेंगे..
NRC का एक छोटा ट्रेलर देश असम में देख चुका है.केवल एक राज्य की NRC प्रक्रिया में लगभग 1,600 करोड़ रुपये खर्च हुए और 10 साल से ज़्यादा का समय लगा..
अंतिम सूची में करीब 19 लाख लोग बाहर हो गए, जिनमें से कई ऐसे थे जिनके परिवार के बाकी सदस्यों के नाम सूची में थे. इनमें पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के रिश्तेदार और भारतीय सेना के रिटायर्ड अफसर तक शामिल थे.
–भारत की एक बहुत बड़ी आबादी विशेषकर ग्रामीण इलाकों में, गरीबों, आदिवासियों और प्रवासियों के पास,आज भी अपने जन्म या वंश के पक्के कागज़ात नहीं रखती..
देश में 1989-90 से पहले जन्म प्रमाण पत्र डिजिटल रूप से बनाने का चलन शायद ही था.
बाढ़, आग, विस्थापन या गरीबी के कारण लाखों लोग अपने पुराने रिकॉर्ड खो चुके होते हैं. ऐसे में 130 करोड़ से ज़्यादा लोगों से दशकों पुराने कानूनी सबूत मांगना एक Nightmare जैसा होगा.
–भारत में सरकारी कागज़ातों में नाम, सरनेम या उम्र की स्पेलिंग में गलतियाँ होना बहुत आम है. असम में सिर्फ स्पेलिंग की मिसमैच की वजह से लाखों लोग अपनी नागरिकता साबित करने में उलझ गए.
–और आखिर में सबसे बड़ा व्यावहारिक सवाल यह है कि यदि प्रक्रिया के अंत में देश के कुछ लाख या करोड़ लोग अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाए,भले ही कागज़ात न होने के कारण, तो सरकार उनका क्या करेगी?
क्या उन्हें Detention Centers में रखा जाएगा? इतने बड़े पैमाने पर डिटेंशन सेंटर बनाना और उन्हें चलाना आर्थिक और मानवीय दोनों मोर्चों पर लगभग असंभव सी बात है.
क्योंकि ऐसे लोगों को किसी दूसरे देश जैसे बांग्लादेश या म्यांमार भी नहीं भेजा जा सकता, क्योंकि जब तक वह देश उन्हें अपना नागरिक स्वीकार नहीं करता, तब तक वे अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत 'Stateless' हो जाएंगे..
यही सारी चुनौतियां हैं जिनकी वजह से पिछली सरकारों ने कानूनन रूपरेखा होने के बावजूद, इसे पूरे देश में लागू करने के कदम बहुत फूंक-फूंक कर रखा. पिछली सरकारों के इस एहतियात को आज की सरकार आरोप के रूप में देश की जनता के सामने परोसती है कि पिछली सरकारों ने देश में घुसपैठियों को शरण दी.
यही वे आर्थिक और सामाजिक चुनौतियां हैं, जिनकी वजह से राष्ट्रीय स्तर पर इसे लागू करने का फैसला हमेशा से पिछली सरकारों के लिए एक बड़ा संवेदनशील मुद्दा रहा है.

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